एस्था और राहील, अरुंधति रॉय के बुकर पुरस्कार प्राप्त प्रथम उपन्यास द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स (GOST) के सात वर्षीय जुड़वा पात्र, ने स्वयं को बचाने के लिए कुछ सरल नियमों का सहारा लिया था। GOST पढ़ते समय आप यह अवश्य महसूस करते हैं कि रॉय का इन भाई-बहनों से गहरा और अविभाज्य संबंध है। Mother Mary Comes To Me इसी बात की पुष्टि करता है, साथ ही उन खतरों की भी, जिनसे वह और उसका भाई ललित कुमार क्रिस्टोफ़र रॉय (LKC) अपनी माँ मैरी रॉय की देखरेख में बड़े होते हुए लगातार जूझते रहे।
अपनी समर्पण-पंक्ति (dedication) में, अरुंधति लिखती हैं कि उनकी माँ ने कभी भी “Let It Be” नहीं कहा, जैसा कि बीटल्स के प्रसिद्ध गीत में मदर मैरी कहती हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि वह अपनी माँ को निजी तौर पर किस तरह संबोधित करती थीं, लेकिन इस किताब में अरुंधति अपनी माँ को पूरे समय “मिसेज़ रॉय” कहती हैं – और सिर्फ़ अंत में, मज़ाकिया ढंग से, उन्हें “मार्ट रॉय” कहती हैं, मानो एक निजी चुटकुले की तरह। इस तरह, उन्होंने अपने और माँ के बीच एक सुरक्षित दूरी बनाए रखी।
मैरी रॉय एक प्रबल व्यक्तित्व थीं- प्रतिभाशाली, सक्षम और कुशल, लेकिन उनका स्वभाव चिड़चिड़ा और अक्सर अप्रत्याशित गुस्से से भरा हुआ था। वे अथाह उदारता और निर्मम क्रूरता – दोनों के लिए सक्षम थीं। हमें शुरू में ही पता चलता है कि मैरी रॉय के पिता भी हिंसक स्वभाव के पारिवारिक व्यक्ति थे। अरुंधति लिखती हैं— “उन्होंने अपने बच्चों को कोड़े मारे, उन्हें अक्सर घर से निकाल दिया, और मेरी दादी की खोपड़ी को एक पीतल के फूलदान से फाड़ दिया।” मैरी ने अपने पिता से यही हिंसक प्रवृत्ति विरासत में पाई थी। एक अकेली माँ होने के नाते वह लगातार अपने परिवार से संघर्ष में उलझी रहती थीं, और अक्सर उन्हें जो अपमान सहना पड़ता था, उसका बोझ तुरंत अपने बच्चों पर डाल देती थीं।
जहाँ बचपन में अरुंधति के लिए अपनी माँ से प्रेम और लगाव (परिस्थितियों के हिसाब से कुछ हद तक अव्यावहारिक) उनकी आत्मकथा में एक गर्म कंबल की तरह पसरा हुआ है, वहीं उनकी माँ के अचानक और बिना वजह किए गए शब्द-बाण उन्हें भीतर तक हिला देते थे—
“जब वह मुझसे नाराज़ होतीं, तो मेरी बोलने की शैली की नकल करतीं। वह अच्छी नक़लची थीं और मुझे खुद ही अपने ऊपर हास्यास्पद बना देतीं। मुझे हर बार की हर बात साफ़-साफ़ याद है। यहाँ तक कि मैं उस समय क्या पहनी हुई थी। यह ऐसा लगता था जैसे उन्होंने मुझे काटकर निकाल दिया हो—एक चित्र पुस्तक से तेज़ कैंची से मेरी आकृति को काटकर अलग कर दिया हो और फिर मुझे टुकड़े-टुकड़े कर फाड़ दिया हो।”
Mother Mary Comes To Me के पहले हिस्से में ये “नरक के विविध संस्करण” हर कुछ पन्नों पर आपको झकझोर कर रख देते हैं। और जब आप भीतर से उछलकर प्रतिक्रिया देते हैं, तब आपके भीतर दर्द की एक गाँठ बैठ जाती है। यह प्रभाव अक्सर अरुंधति की गद्य-शैली का उनके पाठकों पर रहा है, और उनकी आत्मकथा भी इसका अपवाद नहीं है। इसे पढ़ते हुए आप समझने लगते हैं कि उनकी ताक़त कहाँ से उपजती है—उन शुरुआती लेखन में प्रयुक्त वे शीर्षक-शैली वाले ज़ोरदार वाक्यांश भी इसी स्रोत की झलक देते हैं।
इसलिए, आपको हर मोड़ पर घात लगाए बैठे ख़तरों से सावधान रहना होगा, ठीक वैसे ही जैसे रॉय भाई-बहन को अपने बचपन में रहना पड़ा था। किताब में ऐसे वाक्य हैं जो अचानक पाठ से बाहर छलांग लगाकर आपको अपनी प्रचंड ताक़त से घायल कर देते हैं। आपको इसके लिए तैयार रहना होगा—लेकिन साथ ही पाठ में बिखरे हुए हास्य और मानवीय ऊष्मा का भी आनंद लेना होगा। अरुंधति की आत्मकथा एक खतरनाक यात्रा है—तेज़ मोड़ों और खड़ी चढ़ाइयों से भरी हुई—जो आपको कभी चीख दबाने और कभी ज़ोर से हँस पड़ने पर मजबूर कर देती है। और यह कभी-कभी अनजाने में आ जाने वाला हास्य राहत देने वाला और बेहद स्वागत योग्य है।
कुछ छोटे-छोटे क्षण ऐसे आए जब मैरी रॉय ने एक कोमल हृदय की झलक दिखाई – लेकिन वह जल्दी ही अपने सामान्य रूप, गुस्से और आत्म-धार्मिकता में लौट आतीं और अपने दबंग और उग्र व्यवहार को जारी रखतीं। बहुत आरंभ में ही उन्होंने अरुंधति के मन में यह दृढ़ता से बैठा दिया था कि हमेशा शालीन रहना है और सही काम करना है। अरुंधति का जीवन मानो पहले नियम को अंगूठा दिखाने और दूसरे को अपनाने में बीत गया हो – जो कि उनके पाठकों और प्रशंसकों के लिए एक उपहार बन गया।
मैरी रॉय की निर्दयता और “मातृत्व के प्रति उनका क्रोध” उनकी बेटी के लिए उतना ही आकर्षक है जितना उनके पाठकों के लिए। लेकिन जो असाधारण है, वह है अरुंधति का तथ्य लिखने का बिल्कुल सपाट और सटीक तरीका—न तो किसी तरह का निर्णय, न ही पीड़िता होने का भाव—और आक्रामक माँ के प्रति सहानुभूति बनाए रखना, भले ही वह किसी भी रूप में गांधीवादी न हों। रॉय अपनी माँ को प्रेमपूर्वक ‘गैंगस्टर’ कहती हैं, लेकिन कभी ‘राक्षस’ नहीं।
मैरी रॉय ने स्वीकार किया था कि पिता की अनुपस्थिति में उन्होंने अपने बच्चों को “दोगुना” प्यार किया, और अरुंधति ने इसे मानने की कोशिश भी की। लेकिन फिर भी वह अपनी माँ के मातृत्व की प्रचंडता से उलझी, आहत और भ्रमित रहीं। आप महसूस कर सकते हैं कि अरुंधति खुद अपनी माँ के व्यवहार को समझने के लिए संघर्ष करती हैं, उनकी मजबूत पकड़ में असहाय झूलती हुई। आप पूरे विवरण में माँ-बेटी के बीच उस गहरे बंधन को भी महसूस करते हैं, लेकिन साथ ही अरुंधति की उस व्याकुल चाह को भी देखते हैं जिसमें वह खुद को उससे मुक्त करना चाहती थीं।
मैरी रॉय के असाधारण व्यक्तित्व के प्रति जीवनभर की उनकी प्रशंसा, उनके रक्षक के प्रति उनकी अटूट भय-भावना से घुल-मिल जाती है। अरुंधति के लिए, मैरी रॉय अंततः उनकी “शरण और उनका तूफ़ान” दोनों बन जाती हैं—और वह इस द्वंद्व में बहुत लंबा समय फँसी रहती हैं। यह उथल-पुथल भरा अतीत हास्यपूर्ण भी है, दुखद भी, हृदय-विदारक भी और आंदोलित करने वाला भी—ठीक उनकी आत्मकथा की तरह।
अरुंधति की कहानी आखिरकार उनकी माँ की विशाल और अक्सर विकृत-सी उपस्थिति के बिना अधूरी है, और उनका साया उनकी पूरी ज़िंदगी पर छाया रहा। जो आज यह बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका करोड़ों पाठकों के लिए है—अपने “विद्रोही हृदय” के साथ, पीड़ितों के प्रति अपनी गहरी सहानुभूति, स्पष्ट दृष्टि और निर्भीक आवाज़—वह निस्संदेह अद्वितीय मैरी रॉय ने ही गढ़ा। उनके वयस्क जीवन का कोई भी हिस्सा वैसा नहीं होता जैसा हुआ, यदि उनकी माँ न होतीं। इसमें अरुंधति का उस पूर्वानुमानित, स्थिर और जड़ जीवन से घृणा करना भी शामिल है।
बचपन की यादें
रॉय अपनी किताब की शुरुआत अपनी माँ के निधन के बाद कोचीन उतरने से करती हैं और फिर अपनी स्मृतियों की लंबी उड़ान भरते हुए शैशवावस्था तक लौट जाती हैं। उनके नाना – एक शाही कीटविज्ञानी और पत्नी-पीड़क – के पास ऊटी में एक गेस्ट हाउस था। वह अपनी पत्नी से अलग हो चुके थे और अरुंधति के जन्म के साल ही उनकी मृत्यु हो गई थी। युवा मैरी रॉय ने अपने छोटे बच्चों के साथ उस घर के आधे हिस्से में शरण ली थी। मैरी ने असम की एक चाय बागान में कार्यरत राजीव माइकल रॉय से विवाह तो किया था, लेकिन फिर उस विवाह को छोड़ दिया।
मिकी रॉय, जैसा कि वह प्रचलित नाम से जाने जाते थे, कलकत्ता के एक प्रसिद्ध बंगाली परिवार से आते थे। उन्हें शराब की लत थी और मैरी उन्हें “नथिंग मैन” मानती थीं – उन्होंने बाद में अपने बच्चों से स्वीकार किया था कि उन्होंने केवल इसलिए शादी की थी क्योंकि यह पहला व्यक्ति था जिसने उन्हें प्रपोज़ किया, ताकि वह अपने क्रूर पिता से छुटकारा पा सकें। विवाह में दुखी होकर, मैरी ने अपने बच्चों – चार साल छह महीने के बेटे और तीन साल की बेटी – को उठाया और अपने दिवंगत पिता के कुटीर में जा पहुँचीं। स्पष्ट था कि कोट्टायम ज़िले में उनका घर, जहाँ उनका भाई और वृद्ध माँ रहते थे, किसी भी हालत में विकल्प नहीं हो सकता था, क्योंकि उनसे उनके गहरे टकरावपूर्ण संबंध थे। ऊटी में, मैरी पुराने नौकरों की सदासयता और एक शिक्षण कार्य पर निर्भर थीं, जो उन्हें मिल गया था।
अरुंधति की शुरुआती यादों में से एक है उनकी मां का लगातार दमा (जो ऊटी की ठंडी और सीलन भरी जलवायु से और बिगड़ जाता था), जिसने उनके मन में उन्हें खो देने का डर बसा दिया था (यह भय उनके हृदय में उनकी माँ की मृत्यु तक, साठ वर्षों तक, बना रहा)। लेकिन जल्द ही एक और घटना के आघात ने इस भय को ढँक दिया – उनके मामा जी आइज़क और उनकी दादी उन्हें उनके नाना की संपत्ति से जबरन निकालने आ गए। शायद इसी ने अरुंधति के जीवनभर के लड़ो या भागो वाले स्वभाव को जन्म दिया- वह जीवंत स्मृतियों के साथ लिखती हैं कि कैसे वह मैरी रॉय और एलकेसी के साथ नगर में एक वकील ढूँढ़ने दौड़ रही थीं।
रॉय अपने अस्थिर बचपन को लिखते समय फ्यूजिटिव (भगोड़ा/भागा हुआ) शब्द का प्रयोग करती हैं। यह साफ हो जाता है कि द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स में बच्चों से छुटकारा पाने के लिए माता-पिता की लड़ाई – “तुम ले लो, मुझे नहीं चाहिए” – दरअसल कल्पना नहीं, बल्कि वास्तविकता थी। अरुंधति और उनके भाई को अधिकतर अपने आप पर छोड़ दिया जाता था, क्योंकि मैरी रॉय पर बच्चों की पूरी जिम्मेदारी आ पड़ी थी। हालाँकि उनकी पीड़ा को महसूस करना कठिन है, लेकिन उस समय मैरी रॉय के कष्टों का कोई अंत नहीं था: दमे से बिस्तर पर पड़ी हुई, नौकरी से बाहर और जल्द ही पैसों से खाली। बच्चे “कुपोषित रह गए और उन्हें प्रारंभिक तपेदिक हो गई।”
मैरी रॉय ने अंततः अपना अहंकार निगल लिया और अपने बच्चों के साथ खूबसूरत कोट्टायम देहात, अयमनेम गाँव चली गईं, जहाँ वे अपनी बहन के साथ रहने लगीं, जो उनकी माँ के घर से अधिक दूर नहीं था। उन्होंने मोटर वर्कशॉप की छत पर बने अस्थायी रोटरी क्लब परिसर में एक स्कूल शुरू किया। जैसे-जैसे स्कूल का आकार और प्रतिष्ठा बढ़ती गई, उन्होंने इस संस्था को एक सुनसान पहाड़ी की चोटी पर स्थानांतरित कर दिया, जहाँ प्रसिद्ध वास्तुकार लॉरी बेकर की मदद से एक स्थायी विद्यालय भवन का निर्माण हुआ। समय के साथ यह एक गौरवशाली संस्था बन गई, और मैरी रॉय एक भयंकर और समर्पित शिक्षाविद के रूप में उसके ऊपर गर्व से खड़ी रहीं।
कहीं माँ के रूप में उनकी कठोर प्रेमपूर्ण भूमिका, झगड़ालू बेटी/बहन और दृढ़ शिक्षाविद् के बीच, वह एक सच्ची उपद्रवी भी थीं, जो अपनी ही संपत्ति विवाद में उलझी हुई थीं; यह अंततः उन्हें एक छोटी किंवदंती बना गया। अपने पिता के घर से लगभग बेदखल किए जाने के अपमान और अन्याय ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचाया, जहाँ उन्होंने 1816 के त्रावणकोर उत्तराधिकार अधिनियम को चुनौती दी।
1986 में इस भेदभावपूर्ण क़ानून के रद्द हो जाने के साथ ही, उन्होंने न केवल अपने लिए बल्कि सीरियाई ईसाई समुदाय की महिलाओं के लिए भी अपने पिता की संपत्ति पर समान अधिकार सुनिश्चित कर लिया। यह निस्संदेह भारत में महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई में, विशेषकर संपत्ति और उत्तराधिकार के संदर्भ में, एक महत्वपूर्ण कदम था। अरुंधति की स्पष्ट प्रशंसा और अपनी असाधारण माँ के प्रति गर्व उन हरफों में झलकता है जहाँ वे इस प्रसंग को बयान करती हैं।
इससे पहले, जब अरुंधति किशोरावस्था में प्रवेश कर रही थीं, तो उन्होंने अपनी माँ, उनकी हताशाओं और उनके गुस्से को और अधिक समझना शुरू किया, लेकिन वो चीजें उनको अंसवेदनशील नहीं बना सकीं। युवा ‘नूनी’ (उनका उपनाम) ने यह सब तब तक सहा जब तक वह और नहीं सह सकीं और 16 वर्ष की आयु में घर से भाग जाने का निश्चय किया। कुछ समय पहले लॉरी बेकर से मिलने के बाद, वह वास्तुकला की ओर आकर्षित हुईं और दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर (SPA) में दाखिला लिया।
वह शहर में अपने बैग में एक चाकू और बहुत कम पैसे लेकर पहुँचीं। जीवन कठिन बना रहा, लेकिन अपनी माँ के निकट से स्वयं को दूर कर लेना उनके लिए एक आवश्यकता बन गया था – जैसा कि वह स्वीकार करती हैं, यह उन्हें प्यार करते रहने का एकमात्र तरीका था। उनके द्वारा बनाई गई यह दूरी उन्हें अपनी माँ को बेहतर ढंग से समझने और जीवन भर उनके खिलाफ अपने बचाव में खड़े करने में मददगार साबित हुई।
दिल्ली में उन्होंने एक नई ज़िंदगी की शुरुआत की—दोस्त बनाए, प्यार पाया और आज़ाद होने के सपने देखे। यहाँ हमें मोहक और विविध चरित्रों की एक टोली से परिचय होता है, जिन्होंने उनकी भटकती ज़िंदगी को आकार दिया: गोलक, उनका पहला दोस्त; जीसस क्राइस्ट, अब मशहूर आर्किटेक्ट, जिससे उन्होंने बाद में एक पूरी तरह से क़ानूनी न कहे जाने योग्य शादी की; कार्लो, रहस्यमयी उम्रदराज़ इतालवी व्यक्ति; एसपीए का सुनहरे दाँत वाला चौकीदार—इनमें से कुछ बाद में In Which Annie Gives It Those Ones फ़िल्म में भी नज़र आए।
हालाँकि वह सात वर्षों तक मैरी रॉय से दूर रहीं, फिर भी उनकी माँ उनके जीवन में गहरे रूप से मौजूद रहीं। अरुंधति बताती हैं कि बचपन से ही एक “भूरा कीड़ा” उनका स्थायी साथी रहा है। आयमेनम से सैकड़ों मील दूर भी, वह रुक जाती थीं—हर बार जब वह खुद को मानवीय बंधनों में जकड़ा हुआ पातीं, तो उन्हें लगता कि वह कीड़ा उनके दिल पर रेंग रहा है। उनका सुरक्षित ठिकाना “खतरनाक” हो जाता और वह भाग निकलतीं। वह फिर trenches (खाइयों) में लौट आतीं—प्यार के रिश्तों की डोर काटकर, घरों की सुरक्षा और गर्माहट से दूर होकर, अपनी “फरार” ज़िंदगी को अपनाने के लिए।
अरुंधति का बनना
Mother Mary Comes To Me के दूसरे हिस्से में हम अरुंधति रॉय को बनते हुए देखते हैं—एक अभिनेत्री, पटकथा लेखिका और लेखिका के रूप में। जब उन्हें प्यार और उद्देश्य मिला, तो उनका निजी दुःख और अंधेरा पीछे हट गया, लेकिन अंततः भारत के बिखरते ताने-बाने को देखकर वह शोक और भय से भर गईं। राजनीति उनके लिए निजी हो गई।
उनकी नीरस और हास्यविहीन नौकरशाहों से मज़ेदार भिड़ंत, फूलन देवी के साथ “सम्मति” (consent) के सवाल पर चैनल 4 की एक फ़िल्म बनाते समय संघर्ष, नर्मदा घाटी से उनकी साहसी रिपोर्टिंग, दंतेवाड़ा के जंगलों में बिताए गए अस्थिर दिन और रातें- यह सब हाथ में पकड़े कैमरे की नज़र से सुनाया गया है। जिस अपराध को उन्होंने किया ही नहीं, उसके लिए माफ़ी माँगने से इनकार करने पर उन्हें तिहाड़ जेल में एक अजीब-सी रात गुज़ारनी पड़ी। और फिर उनकी कश्मीर यात्रा शुरू होती है, जिसने उनके उपन्यास The Ministry of Utmost Happiness की बुनियाद रखी।
इस हिस्से के कुछ अंश उनके बचपन के आघात जितने ही कठोर और निर्दय हैं। “राज्य के दुश्मनों” को दिए गए निर्मम और बर्बर दंड को उसकी गद्य-शैली में इतनी तीव्रता के साथ दर्ज किया गया है कि पढ़ने वाला हिल उठता है। अरुंधति अपने अध्याय Walking with the Comrades का अंत इन पंक्तियों से करती हैं:
“महिलाओं में से एक को [अर्धसैनिक बलों ने] उसके बालों से पकड़कर ऊबड़-खाबड़ पथरीली सड़कों पर घसीटा, जब तक कि उसकी खोपड़ी की चमड़ी सिर से अलग नहीं हो गई। मैं तय नहीं कर पाई कि वह कॉमरेड नीति थी या कोई और। कॉमरेड नीति के लंबे, सुंदर बाल तो थे।” वह कॉमरेड नीति से पहले ही मिल चुकी थीं।
उनकी लेखकीय ज़िंदगी के मज़ेदार, विचित्र और कभी-कभी ख़तरनाक प्रसंग इस तीव्र और नाटकीय हिस्से में किसी एक्शन फ़िल्म की पटकथा जैसे लगते हैं। उनकी अपनी गैंगस्टर जैसी जीवन-यात्रा—जो अपने पीछे हैरान और उलझे हुए लोगों का सिलसिला छोड़ जाती है—हास्यप्रद भी है और दिल तोड़ देने वाली भी। इस बीच उनकी निजी ज़िंदगी की झलकियाँ भी दिखाई देती हैं, जिन्हें साहस और दृढ़ विश्वास के साथ बयान किया गया है। उनके पिता, मिक्की रॉय- एक बेहद प्यारे आवारा-से इंसान—जिनसे वह जीवन में बाद में मिलीं और जिन्हें खो दिया, एक संक्षिप्त उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
वे अद्भुत पुरुष, जिन्हें उन्होंने अपना बनाया, कोमलता से उकेरे गए जीवंत पात्र हैं। वह उनके बारे में गहरी गर्माहट के साथ लिखती हैं—प्रदीप कृष्णन और उनकी बेटियों की यादें बेहद सुंदर और haunting प्रतीत होती हैं। और फिर, निश्चित रूप से, उनका भयावह पुराना साथी—भूरा कीड़ा—फिर लौट आता है, और उन्हें हर बंधन तोड़कर निकल जाना पड़ता है। उनकी कहानी के ऐसे असुविधाजनक हिस्से भी हैं जिन्हें वह चाहतीं तो आसानी से मिटा सकती थीं, लेकिन अरुंधति अपनी विशिष्ट ईमानदारी के साथ उन्हें बताती हैं। वह न सिर्फ़ उन्हें बरकरार रखती हैं बल्कि निर्भीक होकर उन्हें स्वीकार भी करती हैं।
अरुंधति रॉय अपने संस्मरण में जितनी निडरता से दूसरों का मूल्यांकन करती हैं, उतनी ही निडरता से अपने और अपनी माँ का भी सामना करती हैं। तमाम चीज़ों के बावजूद—उनके बार-बार के भागने के प्रयास, आत्म-सुरक्षा की कोशिशें, जो अक्सर त्रुटिपूर्ण तर्क पर आधारित थीं—वह अपने आपको और अपने असाधारण परिवार को प्रिय बना देती हैं, पाठक को अपने साथ यात्रा पर ले जाती हैं।
जब मैंने उनके भाई एलकेसी (LKC) के साथ भाई-बहन के प्रेम वाले प्रसंग पढ़े—जहाँ वह उनकी एस्तेर हैं और वह उनका राहेल—तो मेरी आँखों में आँसू आ गए। उनका दयालु और प्रेममय होना आपके दिल को छू जाता है, और यह कि आखिरकार दोनों ने अपनी मानसिक स्थिरता को बनाए रखा और खुद को खोज लिया। उन्होंने अपने अंकल आइज़क से भी प्रेम किया- वह रोड्स स्कॉलर चाचा, जो जीवनभर मैरी रॉय से संघर्ष में उलझे रहे, और अंततः अपनी मुक़दमेबाज़ बहन की वजह से दिवालिया हो गए (उनकी तकरार वाकई हास्यास्पद है)।
और फिर आप उस व्यक्ति के बारे में सोचेंगे, जिसने उन भाई-बहनों को जन्म दिया, उन्हें पंख दिए, और सिखाया कि जीवन को एक साधारण, नीरस ढंग से नहीं जीना है। वही, जिसने अंततः अरुंधति रॉय को—उनका गुरिल्ला-सा दिल, दिमाग और सब कुछ—हम लोगों को दिया।
(संगमित्रा चक्रवर्ती Soumitra Chatterjee and His World की लेखिका हैं। उनकी यह समीक्षा द स्क्रोल से साभार लिया गया है।)